Monday, January 27, 2014

Shri Ganesh Kavacha (Marathi) श्रीगणेश कवच


Shri Ganesh Kavacha (Marathi) 

Shri Ganesh kavacha is in Marathi. Original Shri Ganesh Kavacha from Ganesh Purana; is in Sanskrit. This Marathi Shri Ganesh kavacha is written by Shri Diwakar Anant Ghaisas, based on Original kavacha. I thank him for doing this wonderful job for devotees of God Ganesh. I am really grateful to him and present this kavacha for devotees of God Ganesh. Benefits of Kavacha, Falashruti: as described in Shri Ganesh Kavacha. Removes fear from Ghosts, Body becomes Strong and healthy, If recited before travel then travel becomes trouble free, Victory in war, debate. All difficulties and troubles are vanished. If recited 7 times every day for 21days then desires are satisfied. If recited before going to any governmental work then it becomes successful. If recited 21 times a day for 21 days then the devotee receives Moksha. 

 श्रीगणेश कवच 

परात्पर परमात्मा पूर्ण । ' विनायक ' करो शिखा रक्षण । 
 मस्तकासी करो रक्षण । ' अतिसुंदर-रुप ' तो ॥ १ ॥ 
' कश्यप ' रक्षक ललाटा । ' महोदर ' रक्षो भ्रूतटा । 
लोचनां आणि ओष्ठां । ' भालचंद्र ' ' गजास्य ' तो ॥ २ ॥ 
जिव्हेसी रक्षो ' गणक्रीड ' । हनुवटीसी ' गिरिजासुत ' । 
सांभाळो तो वाचा दंत । ' विनायक ' ' विघ्नहा ' ॥ ३ ॥ 
माझिया कर्णद्वयांते । ' पाशपाणि ' करो रक्षणाते । 
' चिंतितार्थद ' नासिकेते । रक्षण करो सर्वदा ॥ ४ ॥ 
' गणेश ' रक्षो मुखासी । ' धनंजय ' तो कंठासी । 
' गजस्कंध ' तो स्कंधांसी । उर ' विघ्नविनाशक ' ॥ ५ ॥ 
' गणनाथ ' रक्षो हृदयाते । ' हेरंब ' रक्षो जठराते । 
पार्श्र्वभाग रक्षावयाते । सज्ज राहो धराधर ॥ ६ ॥ 
' शुभ ' ' विघ्नहर ' पृष्ठासी । ' वक्रतुंड ' लिंगासी । 
' महाबल ' तो गुह्यासी । रक्षण करो निजबळे ॥ ७ ॥ 
' गणक्रीड ' मम जंघा-जानूते । ' मंगलमूर्ति ' अंकांते । 
गोफे आणिक चरणांते । ' एकदंत ' ' महाबुद्धि ' ॥ ८ ॥ 
बाहूंसी ' क्षिप्र-प्रसादन ' । ' आशाप्रपूरक ' करो रक्षण । 
' पद्महस्त ' अंगुलित्राण । ' अरिनाशन ' नखांते ॥ ९ ॥ 
' मयूरेश ' सर्वांगासी । ' विश्र्वव्यापी ' करो रक्षणासी । 
' धूम्रकेतु ' अन्य स्थानांसी । सर्वही करो सुरक्षित ॥ १० ॥ 
सन्मुख रक्षो ' आमोद ' । पाठीं रक्षो ' प्रमोद ' । 
पूर्व रक्षो सदोदित । ' सिद्धिविनायक बुद्धीश ' ॥ ११ ॥ 
दक्षिणेकडुनी ' उमा-अपत्य ' । ' गणेश्र्वर ' रक्षो नैर्ऋत्य । 
 पक्ष्चिम रक्षो सत्य सत्य । ' विघ्नहर्ता ' तो मम ॥ १२ ॥ 
वायव्येसी ' गजकर्णक ' । आग्नेयेसी ' विधिपालक ' । 
ईशान्येकडुनी रक्षक । ' ईशनंदन ' तो होवो ॥ १३ ॥ 
दिवसा रक्षो ' एकदंत ' । सायं रात्रौ सुरक्षित । 
 ठेवो ' विघ्नहृत् ' संतत । विनंती ' श्रीगणेशा ' ॥ १४ ॥ 
राक्षस असुर वेताळ । ग्रहभुते पिशाचे सबळ । 
तयांपासुनी मम सांभाळ । करो ' पाशांकुशधर ' ॥ १५ ॥ 
' स्मृतिरुपी ' तिन्ही गुण । रक्षण करो ' गजानन ' । 
धर्म वैभव कीर्ति ज्ञान । कुलाचरपालन ॥ १६ ॥ 
पुत्रपौत्र स्नेही मित्र । आप्तइष्ट जे सर्वत्र । 
रक्षण करो पवित्र । गजानन ' स्मृति ' मात्रे ॥ १७ ॥ 
' मयूरेश ' सर्वायुधधर । कृपाछत्र धरो सर्वांवर । 
संबंधी जे जन इतर । अनुकूल ते होवोत ॥ १८ ॥ 
अजादिकां सांभाळो ' कपिल ' । ' विकट ' पाळो अश्र्वगजबळ । 
सर्वथा मज वज्रबळ । ' गजानन ' देवो हा ॥ १९ ॥ 
जो कोणी हे लिहुनी । ठेवील कंठी बांधुनी । 
ताम्रपुटी नीट जपुनी । पिशाचभय टळेल ॥ २० ॥ 
सकाळ माध्याह्न सायंकाळ । पठण करिता त्रिकाळ । 
वज्रापरी देह सकळ । होईल तो तयाचा ॥ २१ ॥ 
यात्रेचिया काळीं म्हणतां । निर्विघ्न होईल ती यात्रा । 
युद्धकाळी पठण करिता । जय रणी पावेल ॥ २२ ॥ 
मंत्र-प्रभावी हो निश्र्चित । अरींचा करील निःपात । 
गणेश तयासी रक्षीत । पुढती तो येवोनी ॥ २३ ॥ 
एकवीस दिनपर्यंत । आवृत्या प्रत्यही सप्त । 
करितां इष्ट फल प्राप्त । निःसंशय ते होतसे ॥ २४ ॥ 
एकवीस वेळां प्रतिदिनब । म्हणतां हे एकवीस दिन । 
बंदीतुनी मोक्ष होऊन । मरण टळेल तेथील ॥ २५ ॥ 
राजदर्शनाकरितां गमन । त्रिवार करावे पठण । 
 नृप अनुकूल वर्तोन । जनी पडे प्रभाव ॥ २६ ॥ 
ॐ गँ गणपतये नमः । मज कृपादृष्टीने पहा । 
गणेश कवचासी महा । पुण्यवंत परं[परा ॥ २७ ॥ 
कश्यप मुद्गल मांडव्य । कवच बोलती पवित्र भव्य । 
मुखोद्गत ते कर्तव्य । मुनि म्हणती श्रीगौरीते ॥ २८ ॥ 
जो नसेल श्रद्धावंत । नसेल भक्ति हृदयांत । 
दुराचारी जो जनांत । तेणे नच म्हनावे ॥ २९ ॥ 
परी दैत्यराक्षसांपासुन । व्हावयाते निजरक्षण । 
नित्य करावे हे पठण । बाधा हरती सर्वही ॥ ३० ॥ 
इति श्री गणेशपुराणी । कवच जे गीर्वाणवाणी । 
प्रकट केले ऋषींनी । सज्जनांचिया रक्षणा ॥ ३१ ॥ 
गीर्वाणवाणी लोपता । लोकांतुनी विस्मृत होता । 
उपलब्ध असावें गणेशभक्तां । प्राकृती म्हणावया ॥ ३२ ॥ 
करुनी श्रीगणेश सेवा । प्रसाद तयाचा घ्यावा । 
ऐसिया धरुनी भावा । ओवियांत गुंफिले ॥ ३३ ॥ 
दिवाकर अनंत-सुत । हेरंब-चरणी विनीत । 
सर्वांलागी विनवीत । मान्य होवो ही सेवा ॥ ३४ ॥ 
॥ इति श्रीगणेश कवच संपूर्ण ॥

Shri Ganesh Kavacha (Marathi) 
 श्रीगणेश कवच


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Thursday, January 23, 2014

ShriHanumatProkta Mantrarajatmak RamStav श्रीहनुमत्प्रोक्त मन्त्रराजात्मक रामस्तव


ShriHanumatProkta Mantrarajatmak RamStav
ShriHanumatProkta Mantrarajatmak RamStav is in Sanskrit. It is a beautiful creation of God Hanuman. God Hanuman is a great devotee of God Ram. Hanuman in this RamStav says that I bow to God Ram who formed a military of monkeys and bears. King of the monkeys was Sugriva. God Ram defeated Ravana with the help of this army of monkeys and bears. Hanuman says that I bow to God Ram who had given kingdom of Lanka to Bibishanan as Bibishanan surrendered to him. Bibishanan told Ram he is surrendering and joining his army. Hanuman says that he is bowing to God Ram who is everywhere and he is greatest. He is being worshiped by Gods, Rushies-Munies. Hanuman says that he bows to God Ram who is in the rupa of God Vishnu and who is very kind and who helped Jatajut to attain Moksha. Fire, Moon and Sun are having the light, heat and Teja given by God Ram who is self-luminous. Hanuman says that I bow to self-luminous God Ram. Hanuman says that I bow to God Ram who killed cruel demons like Khara, Dushan and Trishira in the battle. Hanuman says that I bow to God Ram who removes false knowledge of his devotees and gives them true knowledge and powers so that they can achieve highest spiritual knowledge. Hanuman says that I bow to NarSinha rupi God Ram who is strong and powerful like lion. Hanuman says that I bow to God Ram whom God Indra, Sun, Fire, wind and God Yama are afraid of. Sins are always run away from God Ram (by reciting Name of God Ram sins are vanishes.). Hanuman says that I bow to God Ram who is very kind and who blesses his devotees who may or may not have reached higher spiritual level. Who recites this RamStava becomes a great devotee of God Ram. 
श्रीहनुमत्प्रोक्त मन्त्रराजात्मक रामस्तव 
तिरश्चामपि चारातिसमवायं समेयुषाम् । 
यतः सुग्रीवमुख्यानां यस्तमुग्रं नमाम्यहम् ॥ १ ॥ 
सकुदेव प्रपन्नाय विशिष्टामैरयच्छ्रियम् । 
बिभीषणायाब्धितटे यस्तं वीरं नमाम्यहम् ॥ २ ॥ 
यो महान् पूजितो व्यापी महान् वै करुणामृतम् । 
श्रुतं येन जटायोश्च महाविष्णुं नमाम्यहम् ॥ ३ ॥ 
तेजसाप्यायिता यस्य ज्वलन्ति ज्वलनादयः । 
प्रकाशयते स्वतन्त्रो यस्तं ज्वलन्तं नमाम्यहम् ॥ ४ ॥ 
सर्वतोमुखता येन लीलया दर्शिता रणे । 
रक्षसां खरमुख्यानां तं वन्दे सर्वतोमुखम् ॥ ५ ॥ 
नृभावं यः प्रपन्नानां हिनस्ति च तथा नृषु । 
सिंहः सत्त्वेष्विवोत्कृष्टस्तं नृसिंहं नमाम्यहम् ॥ ६ ॥ 
यस्माद्विभ्यति वातर्कज्वलनेन्द्राः समृत्यवः । 
भियं तनोति पापानां भीषणं तं नमाम्यहम् ॥ ७ ॥ 
परस्य योग्यतापेक्षारहितो नित्यमङ्गलम् । 
ददात्येव निजौदार्याद्यस्तं भद्रं नमाम्यहम् ॥ ८ ॥ 
यो मृत्युं निजदासानां नाशयत्यखिलेष्टदः । 
तत्रोदाहृतये व्याधो मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥ ९ ॥ 
यत्पादपद्मप्रणतो भवत्युत्तमपुरुषः । 
तमजं सर्वदेवानां नमनीयं नमाम्यहम् ॥ १० ॥ 
अहंभावं समुत्सृज्य दास्येनैव रघुत्तमम् । 
भजेऽहं प्रत्यहं रामं ससीतं सहलक्ष्मणम् ॥ ११ ॥ 
नित्यं श्रीरामभक्तस्य किंकरा यमकिंकराः । 
शिवमय्यो दिशस्तस्य सिद्धयस्तस्य दासिकाः ॥ १२ ॥ 
इमं हनुमता प्रोक्तं मन्त्रराजात्मकं स्तवम् । 
पठत्यनुदिनं यस्तु स रामे भक्तिमान् भवेत् ॥ १३ ॥ 
॥ इति श्रीहुनुमत्प्रोक्त मन्त्रराजात्मक रामस्तव संपूर्णम् ॥ 
श्रीहनुमत्प्रोक्त मन्त्रराजात्मक रामस्तव हिंदी भावार्थः 
१) अपने मुख्य शत्रु रावणके विनाशके लिये जिन्होने कपिराज सुग्रीवादि तिर्यक योनिमे उत्पन्न वानर-भालुओंकी सेना संगठित की उन अति उग्र भगवान् रामको मै नमस्कार करता हूँ । 
२) समुद्रतटपर आये बिभीषणको केवल एक बार ' मैं आपको शरण हूँ ' ऐसा कहनेपर जिन्होने लंका आदिके राज्यसहित अपार वैभवको प्रदान किया, उस महावीर श्रीरामको मैं प्रणाम करता हूँ । 
३) जो सर्वव्यापक हैं, सबसे महान् हैं और देवता, ऋषि-मुनियोंसे भी पूजित हैं तथा महान् कृपा-सुधा मूर्तिमान् स्वरुप हैं और उस कृपा-सुधासे जटायुतको भी जिन्होंने संसिक्तकर मुक्त कर दिया, उन महाविष्णुस्वरुप भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूं । 
४) अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य आदि तेजस्वी ज्योतिष्पुंज जिनके तेजसे ही प्रकाशित एवं प्रज्वलित होते हैं और जो स्वयं अपने तेजसे प्रकाशित होते हैं, उन प्रज्वलित तेजोमय भगवान् रामको मै प्रणाम करता हूं । 
५) रणस्थलमें खर-दूषण, त्रिशिरा आदि राक्षसोंसे युद्ध करते समय जिन्होंने अपनी लीलासे अपना मुखमण्डल सभी ओर दिखलाया (और सबका नाश कर दिया), उन सर्वतोमुख भगवान् रामकी मैं वंदना करता हूं । 
६) शरणमें आते ही जो मनुष्योंके सामान्य मोहमय मनुष्यभावको नष्टकर उन्हें लोकोत्तर ज्ञान एवं विशिष्ट दिव्य शक्तियोंसे सम्पन्न कर देते हैं और जो सम्पूर्ण विश्वमे सिंहके समान बली हैं, उन नरसिंह भगवान् रामको मैं नमन करता हूँ । 
७) जिनसे वायु, सूर्य, अग्नि, इन्द्र, यम आदि सभी भयभीत रहते हैं और पाप तो उनके भयसे सदा ही दूर भागता है, उन भीषण रामको मैं नमस्कार करता हूँ । 
८) जो अपने भक्तोंकी किसी योग्यता अपेक्षा किये बिना ही अपने उदार-स्वभावके कारण सदा सब कुछ देते ही रहते हैं और नित्य मंगलस्वरुप हैं, उन परम भद्र-स्वरुप सौजन्यमूर्ति भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ । 
९) जो अपने भक्तोंके मृत्युका समूलोच्छेदन कर उसकी सारी अभिलाषा पूर्ण कर देते हैं, इस सम्बन्धमें वाल्मीकि जो पहले कभी व्याधका काम कर रहे थे, परम प्रमाण हैं । ऐसे मृत्युके भी मृत्यु भक्तवत्सल भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ । 
१०) जिनके चरणकमलो प्रणाम करते ही अधम पुरुष भी अति उत्तम पुरुश बन जाता है, उन जन्मादि षड्विकारोंसे मुक्त, सभी देवताओंके द्वारा वन्दनीय भगवान् रामकी मैं वन्दना करता हूँ । 
 ११) मै (हनुमान्) ब्रह्मैकात्म-भावका परित्याग कर दास्यभाव अर्थात् सेव्य-सेवककी भावनासे अहर्निश लक्ष्मणसहित श्रीसीतारामकी उपासना करता हूँ । 
१२) भगवान् श्रीरामके भक्तोंके लिये यमदूत भी सदाके लिये किंकर (दास, सेवक) बन जाते हैं, उसके लिये दसों दिशाएँ मंगलमयी हो जाती हैं और सभी सिद्धियाँ उसके चरणोमै लोटती है । 
१३) हनुमान्जीद्वारा प्रोक्त इस मन्त्रराजात्मकक स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह भगवान् श्रीरामका भक्त हो जाता है । 
भावार्थ और मूल स्तोत्र कल्याण मई २०१० से आभार तथा धन्यवाद सहित लिया है ।

ShriHanumatProkta Mantrarajatmak RamStav 
 श्रीहनुमत्प्रोक्त मन्त्रराजात्मक रामस्तव


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Thursday, January 16, 2014

ShriGuruDattaTreyAshtakam (Marathi) श्रीगुरुदत्तात्रेयाष्टकम्


ShriGuruDattaTreyAshtakam (Marathi) 
 ShriGuruDattaTreyAshtakam is in Marathi. It is a very beautiful creation of Shri P.P.Vasudevanand Saraswati. He has urged God Dattatreya to bless his devotees who recites this Ashtakam. Those devotees who recite it become happy. All their troubles, diseases and difficulties are removed. God Dattatreya blesses them always.


श्रीगुरुदत्तात्रेयाष्टकम्

तापत्रयाने मम देह तापला ।
विश्रांति कोणी नच देतसे मला ।
दैवें तुझें हें पद लाधलें मला ।
 दत्ता कृपासाउलि दे नमूं तुला ॥ १ ॥
कामादि षड्वैरि सदैव पीडिती ।
दुर्वासना अंग सदैव ताडिती ।
त्राता दुजा कोण न भेटला मला ।
दत्ता कृपासाउलि दे नमूं तुला ॥ २ ॥
देहीं अहंता जडली न मोडवे ।
गृहात्मजस्त्रीममता न सोडवे ।
त्रितापदावानल पोळितो मला ।
दत्ता कृपासाउलि दे नमूं तुला ॥ ३ ॥
अंगी उठे हा अविचार दुर्धर ।
तो आमुचें तें बुडवीतसे घर ।
पापें करोनी जाळितों त्वरें मला ।
दत्ता कृपासाउलि दे नमूं तुला ॥ ४ ॥
 तूंची कृपासागर मायबाप तूं ।
तूं विश्र्वहेतू हरि पापताप तूं ।
न तूजवांचूनि दयाळु पाहिला ।
दत्ता कृपासाउलि दे नमूं तुला ॥ ५ ॥
दारिद्रयदावें द्विज पोळतां तया ।
श्री द्यावया तोडिसी वेल चिन्मया ।
तयापरी पाहि दयार्द्र तूं मला ।
दत्ता कृपासाउलि दे नमूं तुला ॥ ६ ॥
प्रेतासि तूं वांचविसी दयाघना ।
काष्ठासि तूं पल्लव आणिसी मना ।
हें आठवी मी तरि जीव कोमला ।
दत्ता कृपासाउलि दे नमूं तुला ॥ ७ ॥
ह्या अष्टकें जे स्तविती तयावरि ।
कृपा करीं हात धरीं तया शिरीं ।
साष्टांग घालूं प्रणिपात बा तुला ।
दत्ता कृपासाउलि दे नमूं तुला ॥ ८ ॥
॥ इति श्री प.प.वासुदेवानंदसरस्वती विरचितं
श्रीगुरुदत्तात्रेयाष्टक संपूर्णम् ॥
ShriGuruDattaTreyAshtakam (Marathi) 
श्रीगुरुदत्तात्रेयाष्टकम्






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Wednesday, January 15, 2014

Shri Shakambhari Panchakam श्री शाकंभरी पञ्चकम्


Shri Shakambhari Panchakam 
Shri Shakambhari Panchakam is in Sanskrit. It is a beautiful creation of P.p. Adi Shankaracharya. It is a praise of Goddess Shakambhari. Acharya is praising and requesting Goddess to protect him from the BhavSagar. Benefits: Any devotee who recites this Panchakam every day all his difficulties are vanished by the blessings of the Goddess. He also has a long happy healthy, wealthy and successful and peaceful life.


श्री शाकंभरी पञ्चकम् 
श्रीवल्लभसोदरी श्रितजनश्र्चिद्दायिनी श्रीमती । 
श्रीकंठार्धशरीरगा श्रुतिलसन्माणिक्यताटंकका ॥ 
श्रीचक्रांतरवासिनी श्रुतिशिरः सिद्धान्तमार्गप्रिया । 
श्रीवाणी गिरिजात्मिका भगवती शाकंभरी पातु माम् ॥ १ ॥ 
शान्ता शारदचन्द्रसुन्दरमुखी शाल्यन्नभोज्यप्रिया । 
शाकैः पालितविष्टपा शतदृशा शाकोल्लसद्विग्रहा ॥ 
श्यामांगी शरणागतार्तिशमनी शक्रादिभिः शंसिता । 
शंकर्यष्टफलप्रदा भगवती शाकंभरी पातु माम् ॥ २ ॥ 
कंजाक्षी कलशी भवादिविनुता कात्यायनी कामदा । 
कल्याणी कमलालया करकृतां भोजासिखेटाभया ॥ 
कादंवासवमोदिनी कुचलसत्काश्मीरजालेपना । 
कस्तुरीतिलकांचिता भगवती शाकंभरी पातु माम् ॥ ३ ॥ 
भक्तानन्दविधायिनी भवभयप्रध्वंसिनी भैरवी । 
भर्मालंकृतिभासुरा भुवनभीकृद् दुर्गदर्पापहा ॥ 
भूभृन्नायकनंदिनी भुवनसूर्भास्यत्परः कोटिभा । 
भौमानंद विहारिणी भगवती शाकंभरी पातु माम् ॥ ४ ॥ 
रीताम्नायशिखासु रक्तदशना राजीवपत्रेक्षणा । 
राकाराजकरावदातहसिता राकेन्दुबिंबस्थिता ॥ 
रुद्राणी रजनीकरार्भकलसन्मौली रजोरुपिणी । 
रक्षः शिक्षणदीक्षिता भगवती शाकंभरी पातु माम् ॥ ५ ॥ 
श्लोकानामिह पञ्चकं पठति यः स्तोत्रात्मकं शर्मदं । 
सर्वापत्तिविनाशकं प्रतिदिनं भक्त्या त्रिसंध्यं नरः ॥ 
आयुःपूर्णमपारमर्थममलां कीर्ति प्रजामक्षयां । 
शाकंभर्यनुकंपया स लभते विद्यां च विश्र्वार्थकाम् ॥ ६ ॥ 
॥ इति श्रीमतच्छंकराचार्यविरचितं शाकंभरीपंचकं संपूर्णम् ॥ 
Shri Shakambhari Panchakam 
श्री शाकंभरी पञ्चकम्


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Shri Shakambharichi Aarati श्री शाकंभरीची आरती


Shri Shakambharichi Aarati 
Shri Shakambharichi Aarati is in Marathi. We are celebrating Shakambhari Navaratra from Pousha Shuddha Ashtami (8th January 2014) to Pousha Pournima (16th January 2014). I am uploading this Aarati for the devotees of Goddess Shakambhari.  
श्री शाकंभरीची आरती 
दैत्यें सुरजन गांजित पडला दुष्काळ । 
देखुनि दानव वधिसी सक्रोधें प्रबळ । 
 शाखा वटुनि पाळिसी विश्र्वप्रिय सकळ । 
भक्ता संकटी पावसी जननी तात्काळ ॥ १ ॥ 
जय देवी जय देवी जय शाकंभरी । 
श्री वनशंकरी माये आदि विश्र्वंभरी ॥ धृ. ॥ 
सद्भक्ति देवी तू सुर सर्वेश्र्वरी । 
साठी शाखा तुज प्रिय षड्विध सांभारी । 
तिळवे तंबिट कर्मठ द्वादश कोशिंबीरीं । 
पापड सांडगे वाढिती हलवा परोपरी ॥ २ ॥ 
जय देवी जय देवी जय शाकंभरी । 
श्री वनशंकरी माये आदि विश्र्वंभरी ॥ धृ. ॥ 
अंबे कर्दळि द्राक्षे नाना फळे जाण । 
दधि घृत पय शर्करा लोणची नववर्ण । 
कथिका चाकवत चुक्का मधुपूर्ण । 
वाढिती पंचामृत, आले लिंबू लवण ॥ ३ ॥ 
जय देवी जय देवी जय शाकंभरी । 
श्री वनशंकरी माये आदि विश्र्वंभरी ॥ धृ. ॥ 
बर्बूरे कडी वडे वडिया वरान्न । 
सुगंध केशरी अन्न विचित्र चित्रान्न । 
भक्ष्यभोज्य प्रियकर नाना पक्वान्न । 
सुरार रायति वाढिती षड्रस परमान्न ॥ ४ ॥ 
जय देवी जय देवी जय शाकंभरी । 
श्री वनशंकरी माये आदि विश्र्वंभरी ॥ धृ. ॥ 
 पोळी सुगरे भरीत आणि वांगीभात । 
पात्रीं वाढिती सर्वही अपूप नवनीत । 
जीवन घेता भोजनी प्रसन्न भक्तातें । 
प्रार्थुनि तांबूल देऊनि वंदी गुरुभक्त ॥ ४ ॥ 
जय देवी जय देवी जय शाकंभरी । 
श्री वनशंकरी माये आदि विश्र्वंभरी ॥ धृ. ॥ 
Shri Shakambharichi Aarati 
श्री शाकंभरीची आरती


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Shri Shakambhari Kavacham श्री शाकंभरी कवचम्


Shri Shakambhari Kavacham 
Shri Shakambhari Kavacham is in Sanskrit. It is from Skand Purana. This Kavacham is told to Shakra (God Indra) by Skanda (KartikSwami). It is a Devi Kavacham. It protects the devotees from all evil things, difficulties, and enemies anywhere.


श्री शाकंभरी कवचम् 
शक्र उवाच 
शाकंभर्यास्तु कवचं सर्वरक्षाकरं नृणाम् । 
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे कथय षण्मुख ॥ १ ॥ 
स्कंद उवाच 
शक्र शाकंभरीदेव्याः कवचं सिद्धिदायकम् । 
कथयामि महाभाग श्रुणु सर्वशुभावहम् ॥ २ ॥ 
अस्य श्री शाकंभरी कवचस्य ॥ स्कंद ऋषिः ॥ 
शाकंभरी देवता ॥ अनुष्टुप छन्दः ॥ 
चतुर्विध पुरुषार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥ 
ध्यानम् 
शूलं खड्गं च डमरु दधानामभयप्रदम् । 
सिंहासनस्थां ध्यायामि देवी शाकंभरीमहम् ॥ ३ ॥ 
कवचम् 
शाकंभरी शिरः पातु नेत्रे मे रक्तदंतिका । 
कर्णो रमे नंदजः पातु नासिकां पातु पार्वती ॥ ४ ॥ 
ओष्ठौ पातु महाकाली महालक्ष्मीक्ष्च मे मुखम् । 
महासरस्वतीं जिव्हां चामुंडाऽवतु मे रदाम् ॥ ५ ॥ 
कालकंठसती कंठं भद्रकाली करद्वयम् । 
हृदयं पातु कौमारी कुक्षिं मे पातु वैष्णवी ॥ ६ ॥ 
नाभिं मेऽवतु वाराही ब्राह्मी पार्श्र्वे ममावतु । 
पृष्ठं मे नारसिंही च योगीशा पातु मे कटिम् ॥ ७ ॥ 
ऊरु मे पातु वामोरुर्जानुनी जगदंबिका । 
जंघे मे चंडिकां पातु पादौ मे पातु शांभवी ॥ ८ ॥ 
शिरःप्रभृति पादांतं पातु मां सर्वमंगला । 
रात्रौ पातु दिवा पातु त्रिसंध्यं पातु मां शिवा ॥ ९ ॥ 
गच्छन्तं पातु तिष्ठन्तं शयानं पातु शूलिनी । 
राजद्वारे च कांतारे खड्गिनी पातु मां पथि ॥ १० ॥ 
संग्रामे संकटे वादे नद्दुत्तारे महावने । 
भ्रामणेनात्मशूलस्य पातु मां परमेश्र्वरी ॥ ११ ॥ 
गृहं पातु कुटुंबं मे पशुक्षेत्रधनादिकम् । 
योगक्षेमं च सततं पातु मे बनशंकरी ॥ १२ ॥ 
इतीदं कवचं पुण्यं शाकंभर्याः प्रकीर्तितम् । 
यस्त्रिसंध्यं पठेच्छक्र सर्वापद्भिः स मुच्यते ॥ १३ ॥ 
तुष्टिं पुष्टिं तथारोग्यं संततिं संपदं च शम् । 
शत्रुक्षयं समाप्नोति कवचस्यास्य पाठतः ॥ १४ ॥ 
शाकिनीडाकिनीभूत बालग्रहमहाग्रहाः । 
नश्यंति दर्शनात्त्रस्ताः कवचं पठतस्त्विदम् ॥ १५ ॥ 
सर्वत्र जयमाप्नोति धनलाभं च पुष्कलम् । 
विद्यां वाक्पटुतां चापि शाकंभर्याः प्रसादतः ॥ १६ ॥ 
आवर्तनसहस्त्रेण कवचस्यास्य वासव । 
यद्यत्कामयतेऽभीष्टं तत्सर्वं प्राप्नुयाद् ध्रुवम् ॥ १७ ॥ 
॥ इति श्री स्कंदपुराणे स्कंदप्रो्क्तं शाकंभरी कवचं सम्पूर्णम् ॥

Shri Shakambhari Kavacham 
श्री शाकंभरी कवचम्


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Monday, January 13, 2014

ShivAshtottarShatNam Stotra शिवाष्टोत्तरनामशतकस्तोत्रम्


ShivAshtottarShatNam Stotra 
ShivAshtottarShatNam Stotra is in Sanskrit. It is from Sahyadri Khanda of Skanda Purana. It is a collection of 108 pious names of God Shiva. This stotra is a creation of all Gods. Benefits: It is said in the stotra that those devotees who listen or recite this stotra become trouble free and they don’t have to face any difficulty in their life. They are not troubled by Grahas. By the blessings of God Shiva they receive good and sound health, longer and happy life, wealth, intelligence and knowledge and success in their any work they undertake.
शिवाष्टोत्तरनामशतकस्तोत्रम् 
 श्रीगणेशाय नमः॥ देवा ऊचुः ॥ 
जय शम्भो विभो रुद्र स्वयंभो जय शंकर । 
जयेश्र्वर जयेशान जय सर्वज्ञ कामद ॥ १ ॥ 
नीलकण्ठ जय श्रीद श्रीकण्ठ जय धूर्जटे । 
अष्टमूर्तेऽनन्तमूर्ते महामूर्ते जयानघ ॥ २ ॥ 
जय पापहरानङ्गनिःसङ्गभद्रनाशन । 
जय त्वं त्रिदशाधार त्रिलोकेश त्रिलोचन ॥ ३ ॥ 
जय त्वं त्रिपथाधार त्रिमार्ग त्रिभिरुर्जित । 
त्रिपुरारे त्रिधामूर्ते जयैकत्रिजटात्मक ॥ ४ ॥ 
शशिशेखर शूलेश पशुपाल शिवाप्रिय । 
शिवात्मक शिव श्रीद सृह्र्च्छ्रीशतनो जय ॥ ५ ॥ 
सर्व सर्वसर्वेश भूतेश गिरिश त्वं गिरिश्र्वर । 
जयोग्ररुप भीमेश भव भर्ग जय प्रभो ॥ ६ ॥ 
जय दक्षाध्वरध्वंसिन्नन्धककध्वंसकारक ।
 रुण्डमालिन्कपालिंस्त्वं भुजङ्गाजिनभूपण ॥ ७ ॥
 दिगम्बर दिशानाथ व्योमकेश चितांपते । 
जयाधार निराधार भस्माधार धराधर ॥ ८ ॥ 
देवदेव महादेव देवतेशादिदैवत । 
वह्निवीर्य जयस्थाणो जयायोनिजसम्भव ॥ ९ ॥ 
भव शर्व महाकाल भस्माङ्ग सर्पभूषण । 
त्र्यम्बक स्थपते वाचांपते भो जगतांपते ॥ १० ॥ 
शिपिविष्ट विरुपाक्ष जय लिङ्ग वृषध्वज । 
नीललोहित पिङ्गाक्ष जय खट्वाङ्गमण्डन ॥ ११ ॥
 कृत्तिवास अहिर्बुघ्न्य मृडानीश जटाम्बुभृत् । 
जगद् भ्रातर्जगन्मातर्जगत्तात जगद्गुरो ॥ १२ ॥ 
पञ्चवक्त्र महावक्त्र कालवक्त्र गजास्यभृत् । 
दशबाहो महाबाहो महावीर्य महाबल ॥ १३ ॥ 
अघोरघोरवक्त्र त्वं सद्योजात उमापते । 
सदानन्द महानन्द नन्दमूर्ते जयेश्र्वर ॥ १४ ॥ 
एवमष्टोत्तरशतंनाम्नां देवकृतं तु ये । 
शम्भोर्भक्त्या स्मरन्तीह श्रृण्वन्ति च पठन्ति च ॥ १५ ॥ 
न तापास्रिविधास्तेषां न शोको न रुजादयः । 
ग्रहगोचरपीडा च तेषां कापि न विद्यते ॥ १६ ॥ 
श्रीः प्रज्ञाऽऽरोग्यमायुष्यं सौभाग्यं भाग्यमुन्नतिम् । 
विद्या धर्मे मतिः शम्भोर्भक्तिस्तेषां न संशयः ॥ १७ ॥ 
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे सह्याद्रिखण्डे शिवाष्टोत्तरनामशतकस्तोत्रं संपूर्णम्
ShivAshtottarShatNam Stotra 
शिवाष्टोत्तरनामशतकस्तोत्रम्


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